हॉरर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हॉरर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 24 मई 2020

वह भयावह रात...


रात के कोई ढाई बज रहे थे.काली तामसिक अँधेरी रात्रि में प्रिया को अचानक खौफ से भरी एक दर्दनाक आवाज़ सुनाई दी । यह आवाज  सुनते ही उसके भीतर भी एक भय पसर गया। व‍ह गहरी नींद में थी, फिर भी सोते - सोते  वह अचानक ठिठक गई थी। भय से सहसा उसकी आँखें खुल गईं तो उसने पाया कि अर्जुन नींद में बड़ी ही तीव्र गति से अपना सिर दाएं से बाएं और बाएँ से दाएँ झटक रहा था।  "छोड़ो, छोड़ो मुझे छोड़ो...! " व‍ह चीख रहा था,पर ठीक से चीख नहीं पा रहा था। व‍ह चीख मानो उसके हलक में अटक गई थी। न जाने अर्जुन को क्या हो रहा था।

बहुत डरते हुए,हौले से जब प्रिया ने उसे झकझोरा तो अर्जुन झटके से अपनी तन्द्रा से बाहर आया। ठंड के मौसम में भी वह पसीने से तर - बतर था। पास ही पड़े हुए चादर से प्रिया उसका पसीना पोंछने लगी  कि व‍ह प्रिया से लिपट कर ज़ोर- ज़ोर से रोने लगा - "प्रिया कोई कस कर मेरा गला दबा रहा था। मैं छुड़ाने की कोशिश कर रहा था पर छुड़ा नहीं पा रहा था और नाकाम हो रहा था। "

"गला दबा रहा था!!! कौन???  पर...पर यहाँ तो कोई भी नहीं है।" - प्रिया के माथे पर बल पड़ गए। चकित होकर उसने अर्जुन से सवाल किया और बिस्तर के पास ही बने स्विच बोर्ड पर हाथ फेरकर उसने तुरंत बत्ती जला दी।

अर्जुन के चेहरे से घबराहट अब भी झलक रही थी।

प्रिया ने खिड़की की ओर देखा। खिड़की  भी तो बंद थी फिर अचानक से अर्जुन को क्या हो गया.... न जाने, कौन- सा डर, कौन-सा भय उसे भीतर से सता रहा था। प्रिया ने उसे सम्भालने की कोशिश की। 
"ऐसा कुछ नहीं है अर्जुन ! देखो... देखो तुम शांत हो जाओ!  यहाँ कोई नहीं था तुमने जरूर कोई भयानक सपना देखा है। " प्रिया तसल्ली देने लगी !

"नहीं प्रिया... कोई था... तुमने कैसे नहीं देखा उसे , वो.... वो मेरे ऊपर चढ़ा हुआ था और मेरी गर्दन उसके हाथ में थी.... वो मुझे जान से मारने की कोशिश कर रहा था..... और तुम कह रही हो कि यहाँ कोई नहीं था। "

  अर्जुन का चेहरा डर के मारे पीला पड़  चुका था। पसीना चूए जा रहा था, मन ही मन वह न जाने क्या सोच रहा था। उसे इस हालत में देख कर प्रिया को भी कुछ घबराहट- सी होने लगी थी। उसे डर लग रहा था कि कहीं अर्जुन की तबीयत न खराब हो जाए। वैसे भी कामकाज के तनाव में आजकल अर्जुन कितना परेशान रहते हैं... प्रिया को कुछ समझ नहीं आ रहा था। फिर भी जैसे - तैसे उसने स्वयं को सम्भाला। 
परंतु अर्जुन!!!अर्जुन तो अभी भी सहमा हुआ बिस्तर के एक कोने में अपने आप को पूरी तरह समेट कर बैठा हुआ था। प्रिया ने फिर से एक बार उसे ज़ोर से झकझोरा कि व‍ह उस भयावह स्वप्न से बाहर निकले। 
कुछ इधर- उधर की बातें करके और उन्हें समझा -बुझाकर किसी तरह उसने अर्जुन को सुला दिया।

सुबह होते ही प्रिया चाय लेकर जब कमरे में पहुंची तो अर्जुन भी जाग चुका था। रात की बात निकली - "थैंक्स प्रिया!!"

"थैंक्स!!! थैंक्स किसलिए अर्जुन। "

"थैंक्स इसलिए प्रिया... कि रात में अगर तुम सही समय पर मुझे नहीं जगाती तो डर के मारे सपने में ही शायद मेरी जान निकल जाती."

"अरे...ये कैसी बातें कर रहे हैं... प्लीज ऐसी बातें मत कीजिए अर्जुन!" रात की घटना उसकी आँखों से सामने एकबार फिर घूम गई ।" आपको इस हालत में देखकर एक पल के लिए मैं भी बहुत घबरा गई थी। चारों ओर सन्नाटा- पसरा था और मेरे और तुम्हारे भीतर एक डर।  ये मन भी न... न  जाने क्या - क्या सोचने लगता है। "

  " ख़ैर छोड़िए इन बातों को ... और वैसे भी... ... "मेरे होते हुए आपको कुछ नहीं हो सकता। " - अर्जुन के करीब जाकर प्रिया ने अर्जुन का हाथ थामकर कहा।

  प्रिया को छेड़ते हुए अर्जुन मजाकिया अंदाज़ में बोला-   "अच्छा ज़ी ... तो क्या तुम सावित्री हो... जो यमराज से मेरे प्राण छीन लाओगी."

" जी मेरे हुजूर.... . " जैसे ही प्रिया ने  शरारती लहजे में ये शब्द कहे, दोनों की हँसी से पूरा घर गूँज उठा। घर के माहौल में अब  सजीवता आ गई थी।  प्रिया को  अर्जुन ने अपने आलिंगन में ले लिया। अब वे रात की काली छाया से कोसों दूर जा चुके थे।



पिकनिक की वह रात

    

      अनन्या अपनी स्कूल की दो दिवसीय पिकनिक पर गई थी। पूरा दिन उसने अपने दोस्तों के साथ बस में खूब हो हल्ला किया। हरी - हरी घास, चारों ओर हरियाली, पास ही बहती नदी और उसका ठंडा शीतल जल। प्रकृति के बीच आकर उसे खूब अच्छा लग रहा था। प्रकृति के सानिध्य में स्कूल कैम्प द्वारा आयोजित किए गए विभिन्न  क्रियाकलापों में दिन कैसे बीत गया पता ही नहीं चला।शिक्षक भी सभी बच्चों को यथास्थान सुलाकर सोने चले गए।

कुछ घंटा भर ही बीता था कि अनन्या जोर से चीख़ी। चीख सुनते ही सब घबराकर नींद से जाग गए और अनन्या की ओर भागे। अनन्या अपने बिस्तर में नहीं थी। उसकी आवाज बाहर झाड़ियों से आ रही थी। रात का समय था। अंधेरा भी काफी था इसलिए किसी को कुछ नजर भी नहीं आ रहा था। तभी टॉर्च की रोशनी में किसी छात्र ने देखा कि एक बड़ी मोटी जंगली मकड़ी ने उसकी उंगली में काट लिया था और  बड़ी तेज गति से दूसरी तरफ रेंगते हुए पल भर में हुए झाड़ियों में लुप्त हो गयी।

काटे हुए स्थान पर अनन्या को बहुत जलन महसूस हो रही थी। उसकी साँसे भी तेज हो रही थी। कराहते- कराहते उसने अपनी सहपाठी और प्रिय सहेली लीना को व‍ह सोने की अंगूठी उठाने का इशारा किया जो उसकी उंगली से गिर गई थी।

कदाचित् उस अंगूठी को ढूँढते वक़्त ही उस मकड़ी ने इसे काट लिया था; जिसके विष के असर से उसके पूरे शरीर पर लाल रंग के चकत्ते उभर आए थे और उसे साँस लेने में भी परेशानी महसूस हो रही थी। 
तभी अचानक से भीड़ में से किसी अजनबी ने कहा, "हटो, हटो! मुझे देखने दो!"

अनन्या को देखते ही वह अजनबी समझ गया कि उसे किसी मकड़ी ने ही काटा है।  उसने तुरंत उसे उठाया और सबको ढांँढस बंधाते हुए अपनी झोपड़ी की ओर भागा।तेज भागने के कारण उसकी आवाज़ में भी कंपन थी।

"आप लोग चिंता मत कीजिए..... बिटिया को कुछ नहीं होगा..... ये ठीक हो जाएगी...... इसका इलाज है मेरे पास.... मैं यहीं रहता हूँ.... पास ही मेरी झोपड़ी है..... अभी मैं जड़ी - बूटी लगाए देता हूँ... बस आधे घंटे में बिटिया ठीक हो जाएगी... बच्चों! तुम लोग भी अधिक परेशान मत हो.... सब ठीक हो जाएगा !"

   सभी बच्चे और शिक्षक घबराए हुए उसके पीछे - पीछे तेज गति से भागे जा रहे थे । किसी स्थानीय व्यक्ति की सहायता लेने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं था। ऐसी परिस्थिति में उन्हें  कुछ और सूझ भी नहीं रहा था। उस ग्रामीण ने बड़ी शीघ्रता दिखाते हुए ज़ड़ी - बूटियों को पीस कर सभी प्रभावित स्थानों और उसकी उंगली पर लगा दिया। 

  आधे घंटे बाद जब अनन्या को थोड़ी राहत महसूस हुई तो वहाँ उपस्थित सब लोगों ने चैन की साँस ली। सबके चेहरों पर मुस्कान खिल गई। उस ग्रामीण का और ईश्वर का धन्‍यवाद करके वे उसी दिन अपने घर वापस आ गए। उस दिन से अनन्या के मन में मकड़ी के लिए एक डर- सा बैठ गया।

कुछ बच्चों को बुरा लगा कि पिकनिक से उन्हें एक ही दिन में लौटना पड़ा। पर उससे ज्यादा खुशी उन्हें इस बात की थी कि अनन्या को कुछ नहीं हुआ और सही सलामत सभी लोग अपने घर लौट आए।

स्वरचित.: सुधा सिंह



वह पीला बैग

"भाभी यह बैग कितना अच्छा है!! कितने में मिला?" नित्या की कामवाली मंगलाबाई ने सोफे पर पड़े हुए बैग की तरफ लालचाई नजरों से इशार...