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शनिवार, 23 मई 2020

अभागिन


जेष्ठ मास की झुलसाने वाली इस कड़ी धूप में राष्ट्रीय राजमार्ग पर जहाँ एक परिंदा भी नजर न आता था, छब्बीस वर्षीय मुनिया उसके एक किनारे पर अपने नवजात बच्ची को अपने सीने पर औंधे मुंह लिटाकर निढाल हो कराह रही थी। उसकी बच्ची भी लगातार रोये जा रही थी।

तभी इस चिलचिलाती धूप में भूखे प्यासे पैदल ही अपने गंतव्य की ओर धीरे धीरे अग्रसर हो रहे कुछ मजदूरों को किसी नन्हें बालक की रोने की आवाज़ सुनाई पड़ी। आवाज सड़क की बाई ओर से आ रही थी।

"अरे  देखो तो लगता है अब ही इसने बच्चे को जन्म दिया है .. इसकी तो नार भी नहीं कटी है... ए सोनू पानी दे रे जल्दी.. देख तो एकर मुँह झुरा (सूखा) गया है.. हे भगवान ..."
राज देव ने अपने साथी सोनू से पानी माँगकर मुनिया को पिलाया ।
"बहिन अब ठीक हो। आपका बच्चा होने वाला था तो आप बाहर क्यों निकली.... क्या आपके साथ कोई है.??"

मुनिया बोलने की हालत में नहीं थी।
राज देव ने यहाँ -वहाँ नजर दौड़ाई परंतु उसे आसपास कोई  नजर नहीं आया।

 "बहन जी, इस बच्ची के पापा कहाँ हैं?आप अकेली कहाँ जा रही हैं???",

 राजदेव ने एक नुकीला पत्थर उठाकर 
दो तीन प्रहार करके बच्चे की लटक रही नार को काट दिया।
कुछ देर बाद जब उसे थोड़ी चेतना आई तो उसकी आँखों का समंदर बह निकला,

"बड़ी अभागिन है ई  बिटिया हमार... एक हफ्ता पहिले जब उ(पति) दम तोड़ दिए तो ओनकर लाश पुलिस वाले उठा ले गए । कारखाना बंद होए से रुपिया पैसा तो कब के खतम हुई गवा..अरे.. इही अभागिन खातिर हमें खिला देते थे केहू तरह... लेकिन खुद पानी पीकर रही जाते थे। एकर पापा भूख बर्दाश् नहीं कर पाए भइया..उ..हमें अकेला छोड़ के चल दिये। अठवाँ महीना चलत रहा ..केकरे भरोसे जिनगी बीतत बाबू ...." अपनी आपबीती बताते -बताते मुनिया फूट -फूटकर रोयी।

फिर खून से सनी अपनी नवजात बच्ची को अपनी मैली कुचैली पैबंद लगी साड़ी में लपेटकर मुनिया अकेली अपने गंतव्य के लिए निकल पड़ी।
और पीछे छोड़ गई रक्त सना इतिहास जिसका जिक्र कालांतर में शायद किसी पन्ने पर न होगा।

सुधा सिंह 'व्याघ्र

गुरुवार, 21 मई 2020

याद नहीं रहा...




"तुमने मुझे सुबह 7 बजे मिलने का वायदा किया था।" 

 "ओह सो सॉरी, मुझे याद ही नहीं रहा।"

"रात के 8 बज रहे हैं प्रिया ; मई की इस भीषण गर्मी में भी पूरा दिन भूखा -प्यासा मैं तुम्हारा इंतजार करता रहा । मेरे हाथों के गुलाब मुरझा गए और तुम बस सॉरी.....।" 

"देखो प्रतीक, मैंने तुम्हें अपना इन्तजार करने के लिए कभी नहीं कहा;  अब फोन रखो और ख़बरदार जो आज के बाद कभी भी मुझे फोन करने की कोशिश भी की तो...." 
दूसरी ओर से आवाज आई-"ठक!!!
औऱ प्रतीक वहीं बिखर गया। प्यार के प्रस्ताव से पहले ही उसका दिल टूट गया था।

रविवार, 17 मई 2020

अभिलाषा


अभिलाषा

   लॉक डाउन के चलते प्रज्ञा का ऑफिस दो महीने से बंद था। 
उस दिन अपने वीमेन्स होस्टल की छत पर अकेली खड़ी -खड़ी प्रज्ञा बाहर का नजारा देखकर बेचैन हो उठी। सूनी सड़कें , खाली गालियाँ , सुनसान बाज़ार मानो मुँह चिढ़ा रहे हों , " लो, तुमने जिस विकास के सपने देखे थे, वो अब तुम्हारे सामने है; सब कुछ तुम्हारी अपनी पसंद का,मेरी बनाई हुई दुनिया तो तुम्हें कभी अच्छी लगी ही नहीं ना.... अब जियो, अपनी बनाई हुई नयी दुनिया में । "

 " नहीं.... नहीं ...मैंने तो कभी भी इस जीवन की अभिलाषा नहीं की थी ,जहाँ अपनों से दूर, सब ईंट - सीमेंट में  पिंजरबद्ध हो जाएँ। सचमुच भागते- भागते....ये कहाँ पहुँच गई हूँ मैं। नहीं.. अब और यहाँ न रह पाऊँगी मैं। प्रकृति और हरियाली के बीच, खेतों- खलिहानों को  फिर से जीवंत करने अब लौट जाऊँगी अपने गाँव। माँ.... पिताजी.... मैं जल्द ही अपना त्यागपत्र देकर आ रही हूँ आप सबके पास...हमेशा- हमेशा के लिए...।",  जैसे किसी ने उसे ज़ोर- से गहरी निद्रा से झकझोर कर जगा दिया हो और वह तुरंत अपना सामान बांधने के लिए तीव्र गति से अपने कमरे की ओर चल दी।


शुक्रवार, 15 मई 2020

पूत- भतार


मीना को जब पता चला कि यशोदा जीजी  शहर से घर आ गई हैं तो घर के सारे काम जल्दी -जल्दी निपटा कर वह उनके घर पहुुँच गई। मीना यशोदा के पड़ोस में ही रहती थी। दोनों में बहुत आत्मीयता थी। अतः यशोदा और मीना की आपस में बड़ी जमती थी। यशोदा थी भी बड़ी दिलवाली । कभी किसी की मदद से पीछे न हटती। गाँव की सभी स्त्रियाँ उसकी सदाशयता से भली भांति परिचित थीं।
व्यापारी होने के नाते यशोदा का पति सोमेश अच्छा -खासा कमा लेता था इसलिए यशोदा की जेठानी चंपा हमेशा यशोदा से कुढ़ा करती थी।


यशोदा को देखते ही मीना के चेहरे पर मुसकान खिल गई। यशोदा के पैर छूकर उसने यशोदा के बच्चे को उसके हाथ से ले लिया और मोहित होकर उससे दुलराने लगी।


" जीजी.. लल्ला कितना सुंदर है !! ओह्ह.. मेरी नज़र न लगे । आठ -ओठ महीने का तो हो ही गया होगा न । बड़ा अच्छा कीं जीजी ..  जो आप आ गईं। बड़ा दिन हो गया था आपको देखे।" कहते -कहते उसने अपनी आँख की एक कोर से काजल निकालकर यशोदा के बेटे के कान के पीछे लगा दिया।


"आना तो था ही मीना, बच्चों की छुट्टियाँ शुरू हो गई हैं और लल्ला का मुंडन भी तो करवाना है न।"-यशोदा ने कहा।

मीना ने यशोदा की बात को बीच में  काटा और यशोदा की जेठानी चंपा की ओर कुटिल मुस्कान फेंकती हुए यशोदा से बोली ," अरे जीजी ,अब तो अब तो आपके पास गहना- गुरिया भी है..और पूत- भतार(भर्तार,पति) भी। अब तो इस घर में आप- सा अमीर और कोई नहीं।"  चंपा पास ही खाट पर बैठी थी । अपनी कही पुरानी बात याद आते ही वह झेंप गई।


यशोदा और चंपा के सामने पिछले साल का वह दृश्य तैर गया । गर्मी की छुट्टियों में पिछली बार जब यशोदा गाँव आई थी तो उसके हाथ में सोने के मोटे -मोटे  नक्काशीदार कंगन थे, जिन्हें देखकर हर कोई उनकी तारीफ कर रहा था। 

उस समय भी चंपा वहीं पास में बैठी थी। चंपा से जब उनकी बातें बर्दाश्त न हुई तो उसने बड़े अहं भाव से सबसे चिढ़कर कहा ,"हंह.. लोगों के पास गहना -गुरिया है  तो क्या हुआ... मेरे पास पूत भतार है।"  , कहकर मन ही मन कुछ बुदबुदाते हुए चंपा वहाँ से उठकर अपने कमरे में चल दी।


अपनी जेठानी द्वारा कही गई इतनी कड़वी बातें सुनकर यशोदा का चेहरा फिर उतर गया  और आँसू आँखों से लुढ़ककर गालों पर आ गए।
उसे केवल तीन लड़कियाँ ही थी। बेटा एक भी नहीं था। चंपा बार- बार यशोदा की इस कमी का अहसास कराती रहती।

परंतु वह कुछ बोल न पाती।बोल भी क्या सकती थी।बेटा या बेटी होना अपने हाथ में तो होता नहीं।
 परंतु विधाता ने पुत्र रत्न देकर इस बार उसकी इस कमी को भी पूरा कर दिया था और चंपा के मुंह पर  भी एक जोरदार तमाचा जड़ा था। वो कहते हैं न कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ नहीं होती। पर न्याय होकर रहता है।



#ब्रह्म हत्या


 ब्रह्म-हत्या

 "अरे ...आज इ गइया एतना काहे बोलत ब  ।" मध्यरात्रि में ज़ोर - ज़ोर से गाय के रंभाने की आवाज़ सुनकर गोरकी की नींद उचट गई।

गाय की आवाज़ में एक अलग ही छटपटाहट थी ।इसलिए
आँखे मलते हुए दरवाजे की सांकल खोलकर गोरकी घर से बाहर की ओर भागी ।उसे लगा गाय को प्रसव पीड़ा हो रही है।शायद इसीलिए वह इतना रंभा  रही है ।परंतु गोरकी जैसे ही बाहर पहुँची, सामने का नज़ारा देखकर वहीं ठिठक गई। 
 गाय के गोठे से आग की बड़ी- बड़ी लपटें उठ रही थी। आग इतनी ज़्यादा तेज़ थी कि गोरकी गोठे के भीतर जाकर खूँटे से बंधी हुई गाय को छुड़ाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी। घबराहट के मारे वह कुछ भी समझ पाने में असमर्थ थी इसलिए मुँह पर हाथ धरकर कुछ पल तक विस्फारित नज़रों से वह उन आग की ऊँची- ऊँची लपटों को देखती रही । चाँद अपनी पूरी रोशनी के साथ आसमान में अपनी छटा बिखरा रहा था।परंतु धीरे धीरे धुएँ के गुबार ने काले बादलों की तरह पूरे आसमान को आच्छादित कर लिया ।
अपनी जान की फिक्र किसे नहीं होती। गोरकी की गाय पूरी तरह से अग्नि की लपटों में घिर चुकी थी। अपनी जान बचाने के लिए वह छटपटा रही थी। खूंटे से बँधी लोहे की सांकल से छूटने  की जद्दोजहद में वह लगातार अपनी सींगों से खूँटे पर प्रहार कर रही थी।

"अरे रमेशवा के बाबू, रमेशवा के बाबू उठा हो  ….गइया के छोड़ावा…..देखा ... गोठवा जरत बा हो…. अब का होइ हो ….अरे माई ...अब का होइ…. हमार गइया मरि जाइ हो…."रोते -रोते गोरकी बेतहाशा अपने पति बसेसर को जगाने के लिए घर के भीतर भागी।

गोरकी का क्रंदन सुनते ही धीरे -धीरे पूरा गाँव बसेसर के  फूंस के बने जलते हुए गोठे के पास इकट्ठा हो गया था।बालटी लोटा ,मटका जो कुछ जिसके हाथ लगा उस में  पास के कुएँ से जल भर -भर कर सब आग बुझाने में जुट गए । किसी तरह आग पर काबू तो पा लिया गया परंतु तब तक बसेसर औऱ गोरकी का सब कुछ लुट चुका था।बसेसर की गाय इसी माह में ब्याने वाली थी। मगर अब कोई उम्मीद नहीं थी। आग में पूरी तरह से झुलस कर गाय धड़ाम से ज़मीन पर गिरी और कुछ ही क्षणों में वह जिंदगी की बाज़ी हार गई। 
"फट….."-  मरते वक्त उसका पेट फटने की बड़ी तेज़ आवाज़ आई।अपने पूरे जीवन काल में ग्रामवासियों ने अपनी आँखों से ऐसा दृश्य नहीं देखा था जो आज देख लिया।
उस आवाज़ ने एक पल के लिए सबकी  साँसे रोक दी थीं।
पेट फूटते ही एक बछिया अपनी माँ के पेट से बाहर ज़मीन पर गिरी । बछिया की सांसें चल रही थी। सबके आश्चर्य का ठिकाना न था।सबने दाँतों तले अपनी उँगली दबा ली। कुदरत का एक नया करिश्मा देखा था सबने।
"बसेसर अऊर ओकर मेहरारू जरूर कउनो अच्छा काम किहे होइहैं ...अरे बहिनी...तबे त बछियवा जीयत बा न।नाही त का ईहो अपने माइ के संघे न मरि ग होत… "रामराज की पतोहू ने आँचल को मुँह में दबाए दबाए आंखों को मटकाते हुए लछमिनिया के सामने बसेसर और गोरकी का पाप पुण्य तौल दिया।
"हाँ बहिन… सही कहू… लेकिन ई जवन कुल जरि ग.. ओकर का…." लछमिनिया ने भी रामराज की पतोहू के सामने अपना पक्ष रख दिया।
पूरे गाँव में तरह- तरह की बात होने लगी।कोई बसेसर और गोरकी को सांत्वना देता तो कोई उनके पाप -पुण्य का फल बताता।

ज्येष्ठ मास की वह भोर बसेसर औऱ गोरकी के लिए सुख का सवेरा नहीं बल्कि दुःख और दर्द का अंधेरा ले कर आई थी। गर्मी के कारण पारा बहुत ऊपर पहुँच चुका था।इसलिए गोठे में रखे पुआल ने आग पकड़ लिया था।गोठे से लगे कच्चे घर में भी आग ने खूब तांडव मचाया था ।पुआल और भूंसे के कारण उसके नीचे दबा कर सुरक्षित रखा गया अनाज भी जल कर ख़ाक हो चुका था।आखिर ग़रीब किसान के पास उसकी पूँजी के नाम पर  होता ही क्या है…. उसके फांके के दिन आ चुके थे।और दस वर्षीय रमेशवा पर जो ब्रह्म हत्या का पाप लगा था उसका भी निवारण करना था। बीती रात गाय को उसने ही तो खूँटे से बाँधा था।
पंडित जी आकर धार्मिक रीति रिवाज़ों के अनुसार अंत्येष्टि संस्कारों की सारी यथोचित विधि ,खर्च आदि सब बता गए। 

"रमेशवा के माइ का करी ..जाइ के साव से करजा लेइ आई   नाही त ...कइसे चली। "बसेसर ने गोरकी से कहा।

" रमेश के बाबू कउनो अउर तरीका ना हौ का…. उ सहुकरवा त   ढेर के सूद लेइ….कइसे चुकी कर्जवा...एक ठे बछियवौ अब मुड़े पे बा ...अब वोहु के चारा- पानी ...हे  भगवान!! ई कौने पाप के सज़ा मिलत हौ…. रमेशवा बेचारा कइसे एतना दिन सम्हारी… उ त अबहीं खुदै नान्ह के  लड़िका हौ। ओकरे बेचारे पे ब्रह्म हत्या लगि ग भगवान ... ई कौने जनम के सज़ा दिहू भगौती माई…." गोरकी माथे पर हाथ धरकर भगवान को दुहाई देने लगी।

गोरकी  की बात सुनकर बसेसर भी सोच में पड़ गया । सूद और कर्ज न चुका सकने का डर उसके मन को भयभीत कर गया।  निढाल होकर वह वहीं खाट पर बैठ गया। 
पर उसके बेटे के सिर पर लगे ब्रह्म हत्या के पाप  का पश्चाताप करने के लिए रीति रिवाज़ों का पालन भी तो करना पड़ेगा। एक ओर कुआँ तो दूसरी ओर खाई। कोई दूसरा चारा भी तो नहीं है यही विचार कर बसेसर उठा और क़र्ज़ माँगने के लिए साव से मिलने उसके घर की ओर चल दिया।







गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

सास धर्म... लघुकथा

सास धर्म 


एक वर्ष के दुधमुंहे बालक की नजर एकाएक जब अपनी दादी की छाती पर पड़ी तो दूध पीने चाहत में व‍ह उनकी छाती को बार - बार स्पर्श करने लगा। यह देख दादी ने  कहा, "एनकर चाचा - बाप त ऐसन नाय रहेन,लागत आ ननिअउरे
पड़ि गएन. "( इसके चाचा और पिता ऐसे नहीं थे, लगता है ननिहाल में किसी को पड़ गया है।)
पालने में ही अपने साल भर के नन्हें- मुन्हें पोते के चरित्र का विश्लेषण करते-करते अधरों पर कुटिल मुस्कान लिए सास ने एक बार फिर से बहू को सताने का अपना सास धर्म निभा दिया था । आँखों में अश्रु लिए अपने साड़ी के कोरों को मसलती हुई असहाय बहू मन मसोस कर पति और ससुर से शिकायत के डर से चुप चाप रसोई में चल दी.

शनिवार, 21 दिसंबर 2019

ये कैसा मापदंड



ये कैसा मापदंड.....
ये कैसा मापदंड...



ये कैसा मापदंड..

नये साल की शुभकामनाएँ देने के लिए ऊर्जा ने जब अपनी सास को फोन किया तो बातों- बातों में उसने महसूस किया कि उनका मूड कुछ उखड़ा उखड़ा - सा है।
मिसाल तो वे अपनी बेटी प्रतिमा की दे रही थी पर उनका इशारा ऊर्जा की तरफ ही था। उलाहना भरे स्वर में वे प्रतिमा की शिकायत करने लगी।
कहने लगी - "प्रतिमा ने भी अभी तीन बजे दोपहर को फोन करके मुझे नए साल की बधाई दी।अपनी बातों पर थोड़ा अधिक जोर देते हुए वे कहने लगी- "मैंने कहा कि नए साल की बधाई देने के लिए, तुम्हारी बुआ का फोन सुबह छह बजे ही आ गया, जबकि वो ननद है मेरी, और तुम, बेटी होकर भी मुझे इतनी देर से फोन कर रही हो। "
तो प्रतिमा कहने लगी - " नहीं... मम्मी , ऐसी कोई बात नहीं है। सुबह से काम में इतनी व्यस्त थी कि समय ही नहीं निकाल पाई। अब जाकर काम से फुर्सत पाई हूँ तो सबसे पहले आप को ही फ़ोन लगाया है। " बेचारी प्रतिमा, उसकी विवशता मैं समझ सकती हूँ - बेटी का पक्ष लेते हुए उन्होंने ऊर्जा की गलती की तरफ इशारा कर दिया. बेचारी ऊर्जा कुछ बोल न सकी और चुपचाप अपनी सास की उलाहना सुनती रही.
फोन रखने के पश्चात ऊर्जा सोचने लगी कि सासू माँ को तीज- त्योहार, होली- दिवाली आदि मौकों पर कोई फोन न करे तो उन्हें बहुत बुरा लगता है। मैं भी तो उनकी तरह ही घर की बड़ी बहू हूँ। उन्होंने कहाँ अपनी बेटी को सिखा दिया कि वह भी बड़े भाई - भाभी को तीज - त्योहार, मौके - धौके पर फोन कर लिया करे। वह तो कभी नहीं करती। हर बार मुझे ही करना ही पड़ता है और किसी मौके पर यदि बुआ फोन न करे तो उन्हें बुरा लग जाता है।
वाह रे! कैसे अजीब मापदंड है ये!!! अपने लिए अलग और दूसरों के लिए अलग!!!

रविवार, 15 दिसंबर 2019

रिश्तों का मोल



 एक ओर सर्दी और ज़ुकाम ;ऊपर से शरीर का तेज ताप । लगातार दो दिनों से रीमा का बुखार चढ़ - उतर रहा था।इसलिए उसने सोचा कि वह अपनी छोटी बहन डॉक्टर अभिधा से दवा ले लेगी और इसी बहाने उससे मुलाकात भी हो जाएगी ।साथ ही साथ व‍ह अपनी छोटी बहन के साथ कुछ अच्छे सुखद क्षणों को साझा भी कर लेगी। एक पंथ दो काज हो जाएंगे। वैसे भी अभिधा की व्यस्तता के कारण रीमा को उससे मिले तकरीबन पांच छः महीनों से ऊपर हो गया था। उसका क्लिनिक रीमा के घर से कुछ तीन चार किलोमीटर की दूरी पर ही था। इसलिए रीमा अकेली ही ऑटोरिक्शा लेकर उसके क्लिनिक पहुँच गई ।

जब व‍ह उसके क्लिनिक पहुँची तो कम्पाउन्डर ने उसे बताया कि डॉक्टर के कैबिन में पहले से ही एक स्किन पेशेंट मौजूद है । इसलिए व‍ह नहीं जा सकती। रीमा ने सोचा कि थोड़ी देर में शायद उस स्किन पेशेंट से फुर्सत पाकर व‍ह उसे स्वयं अपनी कैबिन में बुला लेगी या खुद ही उससे मिलने कैबिन से बाहर चली आएगी। परंतु जैसा व‍ह सोच रही थी वैसा कुछ नहीं हुआ।
 रीमा का बदन बुखार से खूब तप रहा था। इसी कारण उसे बहुत कमज़ोरी भी महसूस हो रही थी। उससे ठीक से बैठा नहीं जा रहा था। फिर भी वह न जाने क्या सोच कर काफी देर तक बैठी रही । उसने सिर उठाकर दीवार की ओर देखा ।घड़ी की सुई नौ बजा रही थी । एक घंटे से ऊपर हो गए थे। रीमा से अब और बैठा नहीं जा रहा था।इसलिए उसने कम्पाउन्डर से कहलवा भेजा कि जाओ कह दो दीदी को तेज बुखार है सर्दी खांसी भी है तो उसकी दवा दे दे। उसने सोचा शायद यह सुनकर ही वह बाहर आ जाए कि दीदी की तबीयत खराब है।
 थोड़ी देर में कम्पाउन्डर भीतर से दवा लेकर लौटी और खुराक समझाते हुए रीमा के हाथ में दवा की पुड़िया थमा दी। रीमा को य़ह बात भीतर तक झकझोर गई कि जिस बहन को वह हमेशा अपने सीने से लगाए रहती थी। आज उसका व्यवहार कितना बदल गया है। तीन चार महीनों से न कोई बात ,न कोई फोन। यही सोचते - सोचते दुखी मन से व‍ह घर लौट आई। उसके मन में तसल्ली थी कि फोन करके अभिधा उसका कुशलक्षेम जरूर पूछेगी। आखिर वह एक डॉक्टर है और ऊपर से उसकी बहन।
 कुछ दिनों में दवाइयों की खुराक से रीमा की तबीयत तो ठीक हो गई परंतु न अभिधा का फोन आया और न अभिधा ही आई । रीमा के हृदय को गहरी चोट पहुँची। यह बात उसने पहले भी कई बार महसूस की थी कि कई दिनों से अभिधा उससे दूरी बना रही थी ।जब- जब रीमा ने उसे फ़ोन कर उससे बात करने की कोशिश की ,तब -तब उसके कंपाउंडर ने ही फोन उठाया और व्यस्तता का बहाना बनाकर फ़ोन काट दिया। उसके मन के किसी कोने में यह बात घर कर गई कि गरीबी सबसे बड़ी बीमारी है। इस बीमारी का कोई इलाज नहीं।जब तक य़ह बीमारी साथ रहती है तब तक अपने भी अपनों को नहीं पहचानते।
 औऱ अभिधा क़े इस व्यवहार ने भी अब इस बात की पुष्टि कर दी थी कि पैसों के आगे रिश्ते का कोई मोल नहीं होता।  

रविवार, 8 दिसंबर 2019

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना.. लघुकथा





बच्चों के स्कूल की छुट्टियां अभी नहीं हुई थी.पतिदेव को अपने खास दोस्त के रिश्तेदार की शादी में जाना था.यूँ कह लीजिए बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना. सभी बस छुट्टियों का इंतजार कर रहे थे. परंतु शादी एक सप्ताह पहले की तय थी. पति जानता था कि घर में पता चला तो पत्नी जाने नहीं देगी.उन्होंने युक्ति लगाई. उस दिन आधी रात को शराब के नशे में चूर हो कर घर आए ताकि शराब पीकर आने पर पत्नी से झगड़ा हो और  युक्ति काम कर गई. घर में  झगड़ा हुआ पति देव अपना बैग पैक करके घर से निकल गए.

सुधा सिंह ✍️

(# 100 शब्दों की कहानी)


रविवार, 14 अप्रैल 2019

वाई-फाई


वाई-फाई खत्म हो गया था और कुछ तंगी भी चल रही थी. बेटे के बार - बार कहने पर भी जब माँ ने वाई-फाई  रीचार्ज नहीं करवाया. तो माँ से उनके मोबाइल का हॉटस्पॉट मांगने लगा.माँ ने सोचा पूरा दिन पबजी खेलता है, इसी बहाने कुछ दिन तो रात में जल्दी सो जाया करेगा इसलिए माँ ने जब हॉटस्पॉट देने से भी मना कर दिया, तो बेटा तमतमाकर बोला, "भाड़ में जाओ."
उस दिन मां बिलख - बिलख कर रोई.
बच्चों को सभी सुख-सुविधाएँ आसानी से मुहैया करा देने का क्या यही परिणाम होता है??

##(100 शब्दों की कहानी)##

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

रीढ़ की हड्डी.. लघुकथा


  एक दिन नटवरलाल जी चलते - चलते दफ्तर में अचानक से गिर पड़े, तो दो चार क्लर्क उठाकर उन्हें अस्पताल ले गए. डॉक्टर ने जाँच करने के बाद कहा कि इनकी रीढ़ की हड्डी कमजोर हो गई है, प्रतिदिन तन कर चलने की कसरत करेंगे तो रीढ़ की हड्डी फिर से ठीक हो जाएगी. कहीं ये ज्यादा झुके- झुके तो काम नहीं करते ?

 तभी अचानक पास ही खड़ा उनका एक सह कर्मचारी दूसरे कर्मचारियों की ओर देखते हुए बोल पड़ा, "डॉक्टर साहब, काश यह गुण हममें भी होता.. आज हम भी इनके जैसे बड़े पद पर बैठे होते.
डॉक्टर साहब अवाक् थे.

सुधा सिंह 👩‍💻

(100 शब्दों की कहानी)

आनंद लीजिए 'रात की थाली ' का भी

गुरुवार, 28 मार्च 2019

संतरे के छिलके....


संतरे के छिलके...



शाम के पांच बज रहे थे। एक विशेष सरकारी काम से मैं और मेरे साथ मेरी दो सह- शिक्षिकाएं ठाणे से लौट रही थीं।ट्रेन प्लैटफॉर्म पर लगी हुई है यह देखकर हम खुश हो गए कि चलो अच्छा है, अब ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। किस्मत भी अच्छी थी कि ट्रेन में चढ़ते ही खाली सीट भी मिल गई। हमारे सामने की ही सीट पर एक महिला भी अपनी नौ दस साल की लड़की के साथ सफर कर रही थी।केवल तीन ही स्टेशनों के बाद उसे उतरना भी था।

ट्रेन चलते ही कई फेरीवाले अपना -अपना सामान बेचते हुए हमारे सामने से गुजरे। परंतु पंद्रह मिनट के इस सफर में कोई भी फेरीवाला ऐसा न था , जिससे उस महिला ने कुछ खरीदा न हो। मोल - भाव करके एक संतरे वाले से उसने दस रुपए के तीन सन्तरे भी खरीद लिए। दो सन्तरे बेटी को पकड़ाकर तीसरा वह खुद खाने लगी।

 जैसे ही संतरे ख़त्म हुए,उसने सारे छिलके एक झटके में ट्रेन की खिड़की से पार कर दिए न आव देखा, न ताव । और फिर जैसे अनजान बनकर सबसे आँखें बचाती हुई अपने पर्स में कुछ ढूँढने लगी। इस बीच उसकी बेटी ने भी सन्तरे खा लिए थे पर असमंजस में बैठी थी कि छिलकों का किया क्या जाए... शायद स्कूल में दी जाने वाली शिक्षा और माननीय श्री मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान का असर उस पर इतना तो हुआ ही था कि वह छिलकों को ट्रेन की खिड़की से बाहर फेंकने से हिचकिचा रही थी और यह भी समझ रही थी उसके ऊपर कभी -कभार हमारी नजर भी चली जा रही है। बहरहाल , थोड़ी देर तक जब उसे कुछ नहीं सूझा तो उसने अपने छिलके भी अपनी माँ को पकड़ा दिए और माँ ने इस बार भी अपने उसी अंदाज में छिलकों को उसके अंतिम गन्तव्य तक पहुँचा दिया। बेटी बगले झाँकने लगी और हम तीनों निशब्द... कहते क्या । बस एक दूसरे का मुँह ताकते रह गए।

सुधा सिंह 👩‍💻

वह पीला बैग

"भाभी यह बैग कितना अच्छा है!! कितने में मिला?" नित्या की कामवाली मंगलाबाई ने सोफे पर पड़े हुए बैग की तरफ लालचाई नजरों से इशार...